सात अजूबों से कम नहीं है दिलवाड़ा जैन मंदिर



माउंट आबू/अनिल कुमार ऐरन
एक इमारत,सदियों पुरानी इमारत।दुनियाभर से लोग उसे देखने आते हैं। उसके दीदार के बाद क्या होता है उनका आप अंदाजा नहीं सकते। चौंधिया जाती है उनकी आंखें। वो बार-बार यही सोचने पर मजबूर हो जाते हैं आखिर अब तक कहां छिपा था।ये नायाब नमूना। दिल को छू जाने वाली इस इमारत को तभी तो लोग कहते हैं।दिलवाड़ा का अजूबा!
ये दिलवाड़ा जैन मंदिर है राजस्थान के इकलौते हिल स्टेशन माउंटआबू में।तस्वीरों में आपने जो कुछ भी देखा शायद कहने की जरूरत नहीं। वाकई हस्तशिल्प का खजाना है ये मंदिर।
मंदिर का एक-एक हिस्सा ऐसा तराशा हुआ है,जैसे अभी बोल उठेगा। ऐसी खूबसूरती जिसका दीदार हर कोई करना चाहता है। कलाकृति और शिल्प का ये बेजोड़ नमूना। मंदिर
की दीवारें,खंभे सबकुछ देखकर आंखें ठहर ही जाती है।इस मंदिर का कोई भी ऐसा कोना नहीं है जो शिल्प से नहलाया नहीं गया हो। मंदिर की एक-एक दीवारें आज अपनी कहानी बयां करती है। अपना इतिहास बताती हैं ये दीवारें। ये वो मंदिर है जिसका दीदार करने देश ही नहीं सात समंदर पार से भी लोग आते हैं। जो कोई भी इस मंदिर के दर्शन एक बार कर ले इसकी ।
सिर्फ एक नहीं बल्कि पूरे पांच मंदिरों का ये समूह हैं।सबकी अलग-अलग पहचान है। इस मंदिर से जुड़ी है कई बातें।कई कहानियां और कई मान्यताएं।जो अपने आप में अनोखी है।
माउंट आबू के आगोश में ये मंदिर आज हर किसी की आंखों का तारा बन गया है। माउंट आबू की सरजमी पर खड़ा ये मंदिर दिलवाड़ा के जैन मंदिर के नाम से जाना जाता है। यहां कुल पांच मंदिरों का समूह जरुर है लेकिन यहां के तीन मंदिर खास हैं। आपको बता दें दिलवाड़ा का ये मंदिर 48 खंभों पर टिका हुआ है। जी हां पूरे 48 खंभे हैं इस मंदिर में। मंदिर की वास्तुकला और शिल्प को देखकर तो आपको अंदाजा लग गया होगा कि ऐसा नमूना शायद ही आपको दुनियाभर में देखने को मिले। तभी को कभी एक लेखक ने इस मंदिर को देखकर कहा था कि ताजमहल अपनी जगह होगा लेकिन ऐसी इमारत दुनिया में कहीं नहीं हो सकती। दिलवाड़ा के मंदिर के बारे में पढ़े जाने वाले कसीदे की इससे बड़ी मिसाल भला और क्या हो सकती है भले ही दिलवाड़ा का ये मंदिर दुनिया के सात अजूबों में शुमार नहीं है। लेकिन यहां के लिए ये मंदिर अजूबा है। लेकिन बदलते वक्त के साथ जैसे-जैसे दुनिया अपनी नंगी आंखों से इस मंदिर की बेमिसाल नक्काशी से दो चार हो रही है।आवाज उठनी शुरू हो गई हैं कि इसे भी अजूबों की फेहरिस्त में जगह मिलनी ही चाहिए।

दिलवाड़ा जैन मंदिर कई नामचीन हस्तियों के दीदार का भी गवाह रहा है। देश के पहले प्रधानमंत्री और पहले राष्ट्रपति ने भी इसका दीदार किया था। इसके बाद इंदिरा गांधी और राजीव गांधी सहित कई सियासी हस्तियों ने इस मंदिर को अपनी आंखों से देखा। जाहिर है मंदिर की अदभुत कलाकृति ने उनके दिलों पर भी गहरी छाप छोड़ी।खूबसूरती और नक्काशी के इस बेमिसाल नमूने के दीदार के बाद तो वो इतने दीवाने हुए कि दोबारा देखने की ख्वाहिश दबा नहीं पाए।वक्त की गर्द मंदिर की चमक को जरा भी फीका नहीं कर सकी। तभी तो ये आज भी उसकी तरह खड़ा है जैसे सदियों पहले था। सफेद संगमरमर से तराशा गया ये मंदिर वाकई कमाल का है।अगर इसे दुनियाभर के सात अजूबों में शामिल करने पर आवाज उठ रही है तो गलत नहीं है।
दरअसल इस मंदिर का निर्माण गुजरात के सोलंकी राजा वीरहवज के महामंत्री वस्तुपाल और उसके भाई तेजपाल ने करवाया था। इस मंदिर की देरानी-जेठानी के गोखलों की उत्कर्ष कला दुनियाभर में प्रसिद्ध है। मंदिर का निर्माण 11वीं और 12वीं शताब्दी में किया गया था। दिलवाड़ा का ये शानदार मंदिर जैन धर्म के तीर्थकरों को समर्पित है। यहां के पांच मंदिरों के समूह में विमल वसाही सबसे प्राचीन मंदिर है जिसे 1031ईसवी में तैयार किया गया। 1231 में वस्तुपाल और तेजपाल दो भाईयों ने इसका निर्माण करवाया था। उस वक्त इस मंदिर को तैयार करने में 1500 कारीगरों ने काम किया था। वो भी कोई एक या दो साल तक नहीं।पूरे 14 साल बाद इस मंदिर को ये खूबसूरती देने में कामयाबी हासिल हुई थी। इस मंदिर को बनवाने में जितना वक्त लगा। उससे कहीं ज्यादा इसे बनवाने में लागत लगी। जी हां थोड़ा बहुत नहीं उस वक्त करीब 12 करोड़ 53 लाख रूपए खर्च किए गए। आप सोच सकते हैं उस वक्त के बारह करोड़ तिरेपन लाख की अभी क्या कीमत हो सकती है.।इतनी लागत औऱ सालों की मेहनत के बाद आज इसकी बेमिसाल खूबसूरती उभरकर सामने आई अगर आज की तारीख में इस मंदिर की कीमत लगाई जाए।तो शायद वो अरबों खरबों में होगी।
इस मंदिर से जुड़ी है कई परंपरा। कई ऐतिहासिक और पौराणिक परंपराओं का गवाह है दिलवाड़ा जैन मंदिर। पौराणिक कथा कहती है कि भगवान विष्णु ने बालमरसिया के रूप में अवतार लिय़ा । कहा जाता है कि भगवान विष्णु का ये अवतार गुजरात के पाटन में एक साधारण परिवार के घर में हुआ। विष्णु भगवान के जन्म के बाद ही पाटन के महाराजा उनके मंत्री वस्तुपाल और तेजपाल ने माउंट आबू में इस मंदिर के निमार्ण की चाहत जाहिर की। ये बात पूरे राज्य में आग की तरह फैल गई। भगवान विष्णु के नये अवतार बालमरसिया ने भी महाराज के इस बात को सुना। और वो वस्तुपाल और तेजपाल के पास इस मंदिर की रुपरेखा लेकर पहुंच गए। तब वस्तुपाल ने कहा कि अगर ऐसा ही मंदिर तैयार हो गया तब वो अपनी पुत्री की शादी बालमरिसिया से कर देंगे। भगवान विष्णु के अवतार बालमरसिया ने इस प्रस्ताव को हाथों हाथ लिया। मंदिर को ऐसा बनाया की देखने वालों की आंखें चौधिया गई। पौराणिक कथा के अनुसार बालमरसिया की होने वाली दादीसास ने छल कर दिया और शादी करने के लिए एक और शर्त रख दी। उन्होंने शर्त रखी कि अगर एक रात में सूरज निकलने से पहले अपने नाखूनों से खुदाई कर मैदान को झील में तब्दील कर देंगे।तब वो अपनी पोती का हाथ बालमरसिया के हाथों में देंगी। जाहिर है बालमरिया भगवान विष्णु के अवातार थे और उनके लिए ये कोई मुश्किल काम नहीं था।उन्होने एक घंटे में ही ऐसा करके दिखा दिया। फिर भी बालमरसिया की होने वाली दादीसास ने अपनी पोती का विवाह उनसे नहीं किया। बाद में इस बात को लेकर भगवान विष्णु कोध्रित हो उठे और उन्होंने अपनी होने वाली दादीसास का वध कर दिया। और बाद में ये जगह कुंवारी कन्या के रुप मे मशहूर हो गई। अगर औरतें यहां आती हैं तो चूडियां चढ़ाती हैं। जबकि इस टीले पर औरतें पत्थर मारने की मान्यता है। पौराणिक कथा कहती है कि इसी जगह भगवान विष्णु ने अपनी होने वाली दादीसास का वध करके दफनाया । श्रद्धालु इस टीले पर पत्थर मारते हैं और ये जगह गवाह बनी बालमरसिया के आजीवन अविवाहित रहने की।

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